Thursday, October 5, 2017

अर्थव्यवस्था की ढलान के दिनों में कोजागरा की रात लक्ष्मी पूजा


(यह लेख आइचौक डॉट कॉम में प्रकाशित हो चुका है)


आइए कि लक्ष्मी की पूजा करें. गुरुवार की रात शरद पूर्णिमा को लक्ष्मी को पूजना जरूरी है.

आप चाहें तो अपनी छत पर या आंगन में खड़े होकर चांद की निहारिए. आप चलेंगे तो चांद चलेगा, आप भागेंगे तो चांद साथ भागेगा, इसी को तो कविताई में कहा है किसी नेः

'चलने पर चलता है सिर पर नभ का चन्दा.
थमने पर ठिठका है पाँव मिरगछौने का.

कभी धान के खेतों में फूटती बालियों के बीच खड़े होकर चांद को निहारा है आपने? खेतिहर इलाकों में जाइए तो धान की बालियों से निकलती सुगंध से मतवाले हो जाइएगा. दूर-दूर तक छिटकी हुई चाँदनी थी और अपूर्व शीतल शान्ति. बस यों कहिए कि 'जाने किस बात पे मैं चाँदनी को भाता रहा, और बिना बात मुझे भाती रही चाँदनी.

मिथिला में नवविवाहित वर-वधू के लिए शरद पूर्णिमा का बड़ा महत्व है. चांदनी रात में गोबर से लिपे और अरिपन (अल्पना) से सजे आंगन में माता लक्ष्मी और इन्द्र के साथ कुबेर की पूजा और अतिथिय़ों का पान-मखान से सत्कार और वर-वधू की अक्ष-क्रीड़ा (जुआ खेलना) कोजागरा पर्व का विशेष आकर्षण है.

नव विवाहित जोड़ों के आनंद के लिए दोनो को कौड़ी से जुआ खेलाया जाता है. चूंकि वधू अपनी ससुराल में नई होती है, जहां वरपक्ष की स्त्रियां अधिक होती हैं, इसलिए मीठी बेइमानी कर वर को जिता भी दिया जाता है.

लक्ष्मी-पूजन के बाद नवविवाहित जोड़े पूरे टोले भर के लोगों को पान-मखान बांटते हैं. कोजागरा के भार (उपहार) के रूप में वधू के मायके से बोरों में भरकर मखाना आता है. मखाने मिथिलांचल के पोखरों में ही होते हैं. दुनिया में और कहीं नहीं. इनके पत्ते कमल के पत्तों की तरह गोल-गोल मगर काँटेदार होते हैं. उनकी जड़ में रुद्राक्ष की तरह गोल-गोल दानों के गुच्छे होते हैं, जिन्हें आग में तपाकर उसपर लाठी बरसाई जाती है, जिससे उन दानों के भीतर से मखाना निकलकर बाहर आ जाता है. बड़ी श्रमसाध्य प्रक्रिया है, जिसे मल्लाह लोग ही पूरा कर पाते हैं.

शरद के चंद्रमा की इस भरपूर चांदनी का मजा सिर्फ मिथिलांचल में ही नहीं लिया जाता बल्कि मध्य प्रदेश, गुजरात, बंगाल और महाराष्ट्र में भी इस दिन लक्ष्मी की पूजा की जाती है. इन इलाकों में खीर के पात्र को रात भर चांदनी में रखकर सबेरे खाया जाता है. कहते हैं, शरद पूर्णिमा की रात में खुले आकाश के नीचे चांदी के पात्र में खीर रखने से उसमें अमृत का अंश आ जाता है.

असल में शरद पूर्णिमा या कोजारगी पूर्णिमा या कुआनर पूर्णिमा एक फसली उत्सव है. आसिन (आश्विन) के महीने में जब खेती-बाड़ी के सारे कामकाज खत्म हो जाते हैं, मॉनसून का बरसता दौरे-दौरा समाप्त हो जाता है, तब यह उत्सव आता है और इसे कौमुदी महोत्सव भी कहते हैं. कौमुदी का अर्थ चांदनी होता है. यह उत्सव गोपियों के साथ कृष्ण के रास का उत्सव है.

दंतकथाएं कहती हैं कि एक राजा अपने बुरे दिनों में दरिद्र हो गया और उसकी रानी ने जब कोजागरा की रात को जागकर लक्ष्मी पूजन किया तो राजा की समृद्धि लौट आई. कोजागरा की रात देवताओं के राजा इंद्र को भी पूजा जाता है.

अब कई लोगों का यह भी विश्वास है कि इन दिनों चांद धरती के ज्यादा नजदीक होता है और औषधियों के देवता चंद्र इन दिनों अपनी चांदनी में देह और आत्मा को शुद्ध करने वाले गुण भर देते हैं.

वेद कहता है कि चन्द्रमा का उद्भव विराट पुरुष के मन से हुआ -'चन्द्रमा मनसो जात:, चक्षो: सूर्यो अजायत (पुरुषसूक्त). चन्द्रमा और सूर्य, इन्हीं दोनो से तो सृष्टि है. चन्द्रमा हमारे जीवन को कई रूपों में प्रभावित करता है. उसका सम्बन्ध पृथ्वी के जलतत्व से है. इसीलिए समुद्र में ज्वार-भाटा चन्द्रमा की कलाओं के अनुसार घटता-बढ़ता है. पूर्णिमा की रात समुद्र का ज्वार अपनी चरम सीमा पर रहता है.

यह कैसा अभिशाप, चांद तक
सागर का मनुहार न पहुंचे,
नदी-तीर एकाकी चकवे का
क्रन्दन उस पार न पहुंचे.

समुद्र-मंथन के बाद महारत्न के रूप में एक साथ निकलने के कारण चन्द्रमा और लक्ष्मी भाई-बहन हुए. चूंकि संसार के पालनकर्ता विष्णु की पत्नी लक्ष्मी जगन्माता हैं, इसलिए उनके भाई चन्द्रमा सबके मामा हैः चन्दा मामा. शास्त्र कहता है कि लक्ष्मी अगर विष्णु के साथ आती हैं, तो उनका वाहन गरुड़ होता है, लेकिन जब अकेली आती हैं तो उनका वाहन उल्लू होता है. मिथिला में कोजागरा की रात की लक्ष्मी-पूजा में त्रिपुरसुन्दरी लक्ष्मी का युवती के रूप में सांगोपांग वर्णन करते हुए उनसे हमेशा अपने घर में रहने की विनती की जाती हैः

या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी
गंभीरावर्तनाभि: स्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया।
लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रै: मणिगणखचितै: स्नापिता हेमकुम्भै:
नित्यं सा पद्महस्ता वसतु मम गृहे सर्वमांगल्ययुक्ता॥

कभी पूजा विधि को गौर से देखिए तो समझ में आएगा कि सामान्य पूजा के बाद बाकी देवताओं को तो अपने-अपने स्थान पर चले जाने का अनुरोध किया जाता है (पूजितोऽसि प्रसीद, स्व स्थानं गच्छ), लेकिन लक्ष्मी को सभी अपने पास ही रहने का आग्रह करते हैं (मयि रमस्व).

कोजागरा की रात महाराष्ट्र का उत्सव थोड़ा अलग होता है. इसमें परिवार के सबसे बड़ी संतान को सम्मान दिया जाता है.

गुजरात में यह शरद पूनम है, जहां गरबा और डांडिया के साथ लोग इसे मनाते हैं., तो बंगाल के लिए यह कोजागरी लक्खी पूजो है. ओडिशा में यह शिव के पुत्र कार्तिकेय की पूजा का दिन है. इसलिए वहां इसे कुमार पूर्णिमा कहते हैं. कार्तिकेय ने इसी दिन तारकासुर के साथ युद्ध किया था. ओडिशा की लड़कियां कार्तिकेय जैसा वर पाने के लिए पूजा करती हैं, क्योंकि कार्तिकेय या स्कंद (जिनको तमिलनाडु में मुरुगन कहते हैं) देवों में मोस्ट एलिजिबल बैचलर हैं. सबसे दिलेर, हैंडसम और खूबसूरत भी. लेकिन विचित्र है कि कार्तिकेय जैसा वर मांगने का दिन होने के बावजूद ओडिशा में इसका कोई कर्मकांड नहीं है. इसकी बजाय सुबह में सूर्य की ही पूजा 'जान्हीओसा' होती है. शाम में चांद की पूजा होती है और उनके लिए खास भोग चंदा चकता बनता है. इसको घी, गुड़, केला, नारियल, अदरक, गन्ने, तालसज्जा, खीरा, मधु और दूध से बनाया है और फिर इसको कुला (पंखे) पर रखा जाता है.

कोजागरा के दिन कटक से आगे केंद्रपाड़ा के तटीय इलाको में गजलक्ष्मी की पूजा भी होती है.

इलाके अलग-अलग है तरीके भी अलग, लेकिन पूजा लक्ष्मी की ही होती है. जीएसटी और नोटबंदी से हलकान देश में पूरे देश को कोजागरा मनाना चाहिए, क्या पता जीडीपी की विकास दर संभल ही जाए.



Saturday, September 30, 2017

रामलीलाः चीर कर रख दूंगा लकड़ी की तरह

दृश्य 1ः
मंच सजा था, बिजली की लड़ियों ने चकाचौंध मचा रखी थी। महागुन मेट्रो मॉल की विशाल इमारत की छत पर मैकडॉनल्ड का लाल रंग का निशान चमक रहा था। इस मॉल की आधुनिकता की चमक के ऐन पीछे मैदान में था मंच. बल्बों की नीली-पीली रौशनी के बीच भगवा रंग के कपड़ो में एक किशोर-सा अभिनेता लक्ष्मण बना हुआ था।

मंच पर मौजूद सारे अभिनेता, जिनमें एक विदूषक, कई वानर लड़ाके और कई राक्षस थे। हनुमान भी। सारे अभिनेता मंच पर हमेशा चलते रहते, तीन कदम दाहिनी तरफ, फिर वापस मुड़कर, तीन कदम बाईं तरफ।

बीच बीच में कोई पंडितजीनुमा आदमी कोई निर्देश दे आता मंच पर जाकर। फिर मंच पर आवाज आती, उद्घोषक की, जिसे अपनी आवाज़ सुनाने में ज्यादा दिलचस्पी थी।

काले कपड़ो में सजे मेघनाद की आवाज़ में ज़ोर था, भगवा कपड़े में सजे लखन लाल की आवाज़ नरम थी। लेकिन तेवर वही...दोनों के बीच संवाद में शेरो-शायरी थी। एक ललकारता...दूसरा उसका जवाब देता।

लखन लाल चीखे, अरे क्या बक-बक करता है बकरी की तरह, चीर कर रख दूंगा, लकड़ी की तरह
भीड़ ने जोरदार ताली बजाई. मैदान में धूल-धक्कड़ है. प्रीतम की धुन बजाता पॉपकॉर्न बेचने वाला है. लकड़ी की तलवारें, गदाएं, तीर-धनुष हैं.

सोच रहा था कि क्या दिल्ली में भी लोग इतने खाली हैं, या फिर कुछ तो ऐसा है इन आधुनिक शहरियों को अपनी ओर खींच रहा है। रामलीला के बगल में, एक जगह ऑरकेस्ट्रा का आय़ोजन है। लडकी बांगला गाने गा रही है, और लगभर सुर के बाहर गा रही है. रामलीला में दृश्य बदलता है, रावण का दरबार सजा है और दो लड़कियां (समझिए अप्सराएं) नाच रही हैं. उनका कमर और कूल्हे मटकाना कुछ भड़कीला ही है. अप्सराएं रावण से कह रही हैं- अमियां से आम हुई डार्लिंग तेरे लिए...
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वह भीड़ से पूछती है, केनो, हिंदी ना बांगला...भीड़ के अनुरोध पर वह हिंदी में गाती है। लौंडिया पटाएंगे, फेविकोल से...मेरे मित्र सुशांत को पूजा के पवित्र पंडाल में यह शायद अच्छा नहीं लगा होगा। मैं तर्क देता हूं कि यह मास कल्चर है। मास को पसंद कीजिए, हर जगह तहज़ीब की पैकेजिंग नहीं चलेगी. 

पिछले साल इसी जगह रामलीला में अप्सराएं फेविकोल वाला गाना गा रही थीं.


यह सही है। यही सही है। आम आदमी, जिसके लिए राम लीला के पात्रों ने हिंदुस्तानी बोलना शुरू कर दिया। संवादों के बीच में ही, मानस की चौपाईयां आती है, जो माहौल में भक्ति का रंग भरने के सिवा कुछ और नहीं करतीं।

अगल बगल गुब्बारे, हवा मिठाई, गोलगप्पे...प्लास्टिक के खिलौने...चाट, भेलपूरी। मुझे मधुपुर की याद आई।

दृश्य़ दोः 
हमारे घर के पास ही एक दुर्गतिनाशिनी पूजा समिति है। दुर्गा की मूर्त्ति के सामने बच्चों के नाच का एक कार्यक्रम है। यह समिति पहले उड़िया समुदाय के लोगों के हाथ में थी, अब उस समिति में बिहारी, बंगाली, उड़िया, पंजाबी, यूपी के सभी समुदायों के लोग है।

सभी घरों के बच्चे नाच रहे हैं, महिलाएं हैं...मेयर साहब आते हैं..। जय गणेशा गाने पर नाचने वाला लड़का बहुत अच्छा नाच रहा है। मैं पहचानता हूं उसे, वह बिजली मिस्त्री है। रोज पेचकस कमर में खोंसे शिवशक्ति इलेक्ट्रिकल्स पर बैठा रहता है। मुसलमान है।

अब किसी को फर्क नहीं पड़ा कि नाचने वाला लड़का किस धर्म का है। किसी को फर्क नहीं पड़ा कि दुर्गा जी ने जिस महिषासुर को मारा है मूर्ति में...उसकी जाति और उसके समुदाय को लेकर बौद्धिक तबका बहस में उलझा है। जनता को फर्क नही पड़ता कि दुर्गा ने किसको मारा है।

देश उत्सवधर्मियों का है, उत्सव मनाते हैं हम।

इसमें विचारधारा को मत घुसेडिए। दुर्गा पूजा को एक प्रतीक भर रहने दीजिए। इसके सामाजिक संदर्भों को देखिए, इसमें और समुदायों को मिलाइए...और सांप्रदायिकता, राम को सांप्रदायिक बना दिया है आपने, अब दुर्गा को भी मत बनाइए।

यह आम लोगों को उत्सव है...उत्सव ही रहे। ऑरकेस्ट्रा बजता रहे, सुर बाहर लगे, कोई दिक्कत नहीं, जय गणेसा पर नाचते रहें लोग...बस।

Thursday, September 21, 2017

शांतनु हत्याकांडः प्रधानमंत्री मोदी के नाम एक खुला खत

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

आप बेहद व्यस्त रहते हैं. आपको व्यस्त रहना चाहिए क्योंकि व्यस्त प्रधानमंत्री होने का सगुन देश के लिए अच्छा होता है. हम छोटे थे तो हमने एक और प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के बारे में सुना था, और हमने अखबारों में पढ़ा था कि देवेगौड़ा कैबिनेट की बैठकों में झपकी लिया करते थे.

मोदी जी आप देवेगौड़ा नहीं हैं. आपने करीब 57 योजनाएं देश के लिए लागू की हैं. 2014 में जब चुनाव हो रहे थे तब पूरे देश के साथ मुझे भी उम्मीद थी कि आप देश के बदलने वाले कदम उठाएंगे. मुझे विकास, जीडीपी की वृद्धि दर, नोटबंदी, जनधन खातों और जीएसटी पर कुछ नहीं कहना है. मैं आपका ध्यान खींचना चाहता हूं पत्रकारों की हत्याओं की तरफ. त्रिपुरा के पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या हो गई है. नौजवान ही था. यह हत्या एक और पत्रकार की हत्या है.

वह नौजवान त्रिपुरा के एक लोकल चैनल का रिपोर्टर था. रिपोर्टर, जी हां, रिपोर्टर. वह संपादक नहीं था. वह किसी सरकार या पार्टी के लिए या उसके खिलाफ़ एजेंडा सेटर नहीं था. मुझे पता है कि शांतनु जैसों के लिए वामी आंदोलनकारी आंसू नहीं बहाएंगे, न फेसबुक पर अपनी डीपी बदलेंगे, न उसकी तस्वीर लेकर जंतर मंतर पर छाती पीटेंगे. कोई मोमबत्ती लेकर मार्च भी नहीं करेगा, क्योंकि वह किसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करता था. शांतनु की मौत पर किसी टीवी चैनल का स्क्रीन काला नहीं हुआ है.

लेकिन, यहीं आकर आपको ज़रा कदम बढ़ा देना होगा. प्रधानमंत्रीजी, आप तो लोकसभा में प्रवेश करने से पहले उसे मंदिर की तरह उसकी सीढ़ियों पर सिर नवाकर गए थे. लोकतंत्र का चौथा खंभा बुरी तरह हमलों से परेशान है. यह हमले पिछले तीन साल में कुछ ज्य़ादा हो गए हैं. 2014 और 2015 में 142 पत्रकारों पर हमले हुए हैं और यह राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड्स ब्यूरो का आंकड़ा है.

2014 में पत्रकारों पर 114 घटनाएं हुई थीं उसमें 32 गिरफ्तारियां हुईं. यह आंकड़ा मेरा नहीं है, यह जानकारी गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर की दी हुई है. 1992 से लेकर आजतक पत्रकारों के काम के सीधे विरोध में 28 पत्रकारों की हत्या की जा चुकी है. यह आंकड़ा भी खामख्याली नहीं है. यह पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनी कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है.

एनसीआरबी का एक और आंकड़ा है जिसमें कहा गया है कि पिछले 3 साल में 165 लोगों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. जी नहीं, जम्मू-कश्मीर के पत्थरबाज या आतंकी होते तो मैं इस आंकड़े के पक्ष में खड़ा होता, इनमे ले 111 बिहार, झारखंड, हरियाणा और पंजाब से हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच (मैं इनके दुचित्तेपन से ऊब गया हूं) कहता है कि भारत में इस साल जून तक 20 दफा इंटरनेट बंद किया गया है. और प्रेस फ्रीडम सूचकांक में भारत 136वें पायदान पर है.

जिन 142 पत्रकारों पर हमले हुए हैं उस सिलसिले में अबतक एक भी आदमी गिरफ्तार नहीं हुआ है.

प्रधानमंत्री जी, आपके विकास और सुशासन के नाम पर जनता ने उमड़ कर वोट किया था. आप साबित कर दीजिए कि देश के करोड़ो लोगों का विश्वास मिथ्या नहीं था. मुझे आपके राजनीतिक फैसलों पर कुछ नहीं कहना है. लेकिन पत्रकारों पर हो रहे हमले विधि-व्यवस्था (हालांकि यह राज्य का विषय है) पर सवालिया निशान लगा रहे हैं. लेकिन 2014 के बाद से हमलों में आई तेजी से आपका नाम खराब हो रहा है. मुझे उम्मीद है कि आप पत्रकारों और चौथे खंभे के निचले स्तर पर काम करने वाले रिपोर्टर्स और मीडियाकर्मियों के लिए कल्याण और सुरक्षा का कोई कदम जरूर उठाएंगे.

प्रधानमंत्रीजी, शांतनु की हत्या पर कुछ कहिए, क्योंकि देश में जो थोड़ी बहुत पत्रकारिता बाक़ी हैं इन्हीं 'शांतनुओं' की बदौलत बची है.

एक पत्रकार



Thursday, September 14, 2017

ठर्रा विद ठाकुरः जलते हैं दुश्मन तो खिलते हैं फूल

गुड्डू भैया अपने दालान में लकड़ी की कुरसी पर उकडूं बैठे हुए थे. मेरे वहां जाते ही
चिल्लाएः ओ ठाकुर ब्रो, कम एंड हैव टी विद मी.
मैं चकरा गयाः भिया आज चौदह सितंबर है. हिंदी दिवस है आज अंग्रेजी क्यों छांट रहे हैं?गुड्डू मुस्कुरा उठे. बोले,
30 के फूल 80 की माला,
बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला
अरे, भैया हिंदी को बचाने वाले दिन आप क्या सड़कछाप शायरी कर रहे हैं. यह तो ट्रक और ऑटो वगैरह पर लिखा होता है. आपको तो पंत-निराला-प्रसाद-बच्चन जैसो की बात करनी चाहिए. इनकी वजह से हिंदी बची हुई है.
गुड्डू ने गिलास में मौजूद सोमरस का लंबा घूंट भरा और कहाः हिंदी कौन सी मर रही है बे? बाजार में कामयाब होगी तो हिंदी बची रहेगी. तुम सेमिनार करके हिंदी नहीं बचा पाओगे. अगर हिंदी का सिनेमा चल रहा है, तो हिंदी बची हुई है. अगर ट्रक, बसों और ऑटो के पीछे हिंदी में कविताएं लिखी जा रही हैं तो समझो आम आदमी की हिंदी वही है. बाकी तुम जो कर रहे हो वह हिंदी की चिंदी है.
क्या बात कर रहे हैं आप, इन गाड़ियों पर लिखे की आप उच्चस्तरीय साहित्य से तुलना कर रहे हैं?उन्होंने तपाक से जवाब दिया: क्यों न करें? सड़क पर लिखी हर इबारत का अपना समाजशास्त्र होता है. देश में इतनी भीड़ है तो लिखाः
जय शिव शंकर, भीड़ ज़रा कम कर
देश में इतनी नफरत है कि गाड़ियों के पीछे लिखना पड़ाः
देखो मगर प्यार से
मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता कि इन गाड़ियों पर लिखे कई जुमले बड़े पुराने और घिसे-पिटे हो चुके हैं. लेकिन तुम ड्राइवरों और कंडक्टरों में छिपे उस शायर के आगे क्यों सजदा नहीं करना चाहते जो ऐसी चीजों को चुनने की और उन्हें गाड़ी पर लिखवाने की नजर रखता है. तुम उनके अनगढ़ मगर सच्चे काव्यबोध से इत्तफाक क्यों नहीं रखते?
नीयत तेरी अच्छी है तो किस्मत तेरी दासी है
कर्म तेरे अच्छे हैं तो घर में मथुरा काशी है
या फिर यह देखो,
फानूस बनकर जीसकी हीफाजत हवा करे
वो शमां क्या बुझे जिसे रौशन खुदा करे
देखो ठाकुर, हिज्जे पर मत जाना पर सड़क के तनाव को कम करने में इन कविताओं का भारी योगदान है. रोड रेज से तपती सड़कों पर ये फुटकर शेर ठंडी छांव का काम करते हैं. हल्की, कच्ची और रूखी तुकबंदी ही सही, लेकिन कविता तो इन लाइनों में होती ही है. ये लोग अपने किस्म के कबीर हैं भाई. कहते तो थे कबीरः जो जो करूं सो पूजा. तो यह जो लिखें, सो कविता….
हमें जमाने से क्या लेना, हमारी गाड़ी ही हमारा वतन होगा
दम तोड़ देंगे स्टियरिंग पर, और तिरपाल ही हमारा कफन होगा…
यह क्या आत्मवंचना और दया नहीं है? क्या यह तुम्हारे साहित्य का के लघु मानव का बयान नहीं है? अनजान और अंदेशों से भरी लंबा यात्राओं में किस तरह ड्राइवर भाई सिर पर कफन बांध लेते हैं, इसका जायजा भी लोः
रात होगी, अंधेरा होगा और नदी का किनारा होगा
हाथ में स्टियरिंग होगा, बस मां का सहारा होगा….
पता नहीं यह पंक्ति जन्म देने वाली मां के लिए है या किसी देवी मां के लिए लेकिन उसके जोखिम कबूल करने का अंदाज तो देखो.चिलचिलाती धूप में जब तपते बोनट की बगल में बैठे ड्राइवरों-हेल्परों को देखो तो पता चलेगा कि सबसे मुश्किल, सबसे खानाबदोश नौकरी इनकी ही होती है. उनकी तकलीफ ‌सिर्फ जिस्मानी ही नहीं होती, उसमें बाल-बच्चों से दूर होने की टीस भी घुली मिली होती है… तुमने भी तो देखा ट्रकों के पीछे बनी तस्वीर में नदी किनारे एक युवती अपने घुटनों में सिर छिपाए बैठी है. साथ में लिखा होता है… घर कब आओगे…और शेर भी हैः
जब परदेस लिखा है किस्मत में
तब याद वतन की क्या करना…
भावनाओं की इस दुनिया में हमें भोगा हुआ यथार्थ और जीवन-दर्शन भी मिलता है, खूब सारी नसीहतें भी. कुल मिलाकर सड़कीय जीवन की सूक्तियां और सुभाषित हैं ये नारे, जिसमें 'स्ट्रीट-स्मार्ट विज़्डम' अर्थात गली-सुलभ बुद्धि है. सुनोः
अपनों से सावधान
दोस्ती पक्की, ख़र्चा अपना-अपना
मांगना है तो ख़ुदा से मांग बंदे से नहीं,
दोस्ती करनी है तो मुझसे कर, धंधे से नहीं.
देते हैं रब, सड़ते हैं सब,
पता नहीं क्यों.
'दुनिया मतलब की' जैसे नारे अगर ज़माने से ठोकर खाए लोगों का चीत्कार है, तो 'अपनों से बचकर रहेंगे, ग़ैरों को देख लेंगे' में एक साथ अपने अस्तित्व का निचोड़ है, तो धमकी भी.
मतलब की है दुनिया कौन किसी का होता है,
धोखा वही देते हैं जिन पर ऐतबार होता है.
नेकी कर जूते खा,
मैंने खाए तू भी खा.
ठाकुर, यह जो ट्रक-साहित्य है न, इसे हल्के में मत लो. इसमें विज़डम है तो मां-बाप जैसी हिदायतें भी. मोहल्लों में, जब ऑटो धीरे चल रहे होते हैं तो बच्चे उसमें लटकने की कोशिश करते हैं. उन्हें वैसे ही डांटा गया है, जैसे हमारे समाज में बच्चों को डांटते हैः
चल हट पीछे!
-लटक मत टपक जाएगा!
-लटक मत पटक दूंगी!
इसका एक झारखंडी संस्करण भी है:
बेटा छूले त गेले
सटले त घटले!
मुझे लगा कि गुड्डू को सही रास्ते पर लाने का यही एक वक्त है. उनसे शराब छुड़वाने वाली शायरियां बुलवा कर. मैंने कहाः भिया, आप शराब छोड़ दीजिए फिर तो, काहे कि गाड़ियों में हर जगह तो इसकी बुराई ही लिखी है.पीकर जो चलाएगा, परलोक को जाएगा
चलाएगा होश में तो ज़िंदगी भर साथ दूंगी,चलाएगा पीकर तो ज़िंदगी जला दूंगी.
बड़ी ख़ूबसूरत हूं नज़र मत लगाना,ज़िंदगी भर साथ दूंगी पीकर मत चलाना.
राम जन्म में दूध मिला, कृष्ण जन्म में घी,
कलयुग में दारू मिली, सोच समझ कर पी.
और भी है,
ऐ दूर के मुसाफ़िर, नशे में चूर गाड़ी मत चलाना।
बच्चे इंतजार में है, पापा वापस ज़रूर आना।।
गुड्डू हंसने लगे. इस ख़राब दुनिया में जो माशूकाएं दिल तोड़ती हैं तो पीसी बरुआ के देवदास से लेकर संजय लीला भंसाली के देवदास और अनुराग कश्यप के देवडी से मुझ जैसे आशिक तक, सहारा सिर्फ इसी मय का है ठाकुर. सुन लो,
शराब नाम ख़राब चीज़ है, जो कलेजे को जला देती है,
उसे बेवफ़ा से तो सही है, जो ग़म को भुला देती है.
ठाकुर तुम ख्वामखा शराब को बदनाम कर रहे हो. एक ट्रक के पीछे लिखा थाः
नशा शराब में होता तो नाचती बोतल.
और,
खुशबू फूल से होती है, चमन का नाम होता है,
निगाहें क़त्ल हैं, हुस्न बदनाम होता है.
बूझे? मैंने समझने का इशारा देते हुए सिर हिलाया. तो गुड्डू भैया बोले, जब तक आम आदमी के पास हिंदी जिंदा है तब तक हिंदी-फिंदी दिवस से कुछ नै होगा. हिंदी जिंदा है और जिंदा रहेगी. और तुम जो हर बात पर शराब की बुराई करते हो, जाओ पंकज उधास की आवाज में मशहूर गज़लें सुनोः जिसके बोल हैः
हुई महंगी बहुत ही शराब कि थोड़ी-थोड़ी पिया करो.
फूंक डाले जिगर को शराब, कि थोड़ी थोड़ी पिया करो...
मैं समझ गया कि गुड्डू भैया काले कंबल है. इन पर कोई रंग न चढ़ेगा. मैं जाने के लिए मुड़ा तो गुड्डू भैया कि आवाज़ आई. अऱे ठाकुर गुस्सा हो कर जा रहे हो, तो एक ट्रक साहित्य का शेर पेश-ए-नजर हैः
चलती है गाड़ी तो उड़ती है धूल
जलते हैं दुश्मन तो खिलते हैं फूल !