Thursday, February 22, 2018

ज़बानी पकौड़े के दौर में मिथिला का तरूआ है सदाबहार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रोजगार का जिक्र करते हुए पकौड़े का नाम क्या लिया, सड़क से लेकर संसद तक हर तरफ पकौड़ा प्रकरण चर्चे में आ गया. इस बयान के लिए कोई तंज कर रहा है, कोई आलोचना. कोई समर्थन में है तो कोई मुखालफत में. मुखालफत में किसी ने पकौड़े की दुकान लगा ली, किसी ने पकौड़ा छानते हुए हाथ जला लिए.

लेकिन, सोशल मीडिया पर चल रही चटखारेदार चर्चा, तमाम राजनीति और आलोचनाओं को किनारे कर दें तो इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि पकौड़े वास्तव में देश के लगभग हर हिस्से में बहुतों को रोजगार दे रहे हैं और उनके परिवार का पेट भर रहे हैं.

पर आज हम पकौड़े के जिस भाई से आप का परिचय करवा रहे हैं वह असल में पकौड़े जैसा दिखता तो है लेकिन यह है मिथिला का तरूआ. इसको बनाने की विधि भी अलग है और किन सब्जियों से तरूआ बनता है उसका रेंज तो खैर विविधता भरा है ही.

इससे पहले की मैं आपको मिथिला के खान-पान के महत्वपूर्ण हिस्से तरूआ से परिचय करा दूं उससे पहले मैं मिथिला के खान-पान के बारे में एक लोकोक्ति बता दूं. मिथिला में खान-पान की संस्कृति में तीन चीजों का होना बेहद जरूरी हैः मिथिलाक भोजन तीन, कदली, कबकब मीन

यहां कदली यानी केला, कबकब यानी ओल या सूरन, और मीन यानी मछली. लेकिन यह जो ओल है उसे तलकर पकौड़े की तरह भी य़ानी तरूआ बनाकर भी खाया जाता है. शायद अचंभा लगे पर मिथिला के भोजन भंडार का यह तो महज एक नमूना है.

तरूआ को लेकर एक अन्य लोकगीत है,

भिंडी भिनभिनायत भिंडी के तरुआ,

आगु आ ने रे मुँह जरुआ

हमरा बिनु उदास अछि थारी,

करगर तरुआ रसगर तरकारी

पूरा अर्थ न जानिए बस इतना ध्यान रखिए कि इस गीत में भिंडी से लेकर काशीफल तक के तरूए का जिक्र है.

तरूआ तो तकरीबन सभी सब्जियों का बनता है. आलू, बैंगन, गोभी, लौकी, कुम्हड़ा (काशीफल), परवल, खम्हार, ओल (सूरन), अरिकंचन (अरबी के पत्ते). लेकिन मिथिला में अतिथि के सत्कार में सबसे महत्वपूर्ण तरूआ होता है तिलकोर का. तिलकोर एक किस्म का कुंदरू जैसे फल का पत्ता होता है, जिसके औषधीय गुण भी होते हैं.

मिथिला में तिलकोर की बेल आपको हर घर की बाड़ी में मिल जाएगा. जानकारों का दावा है कि तिलकोर टाईप वन डायबिटीज के लिए प्राकृतिक चिकित्सा का रामबाण है. मैथिल लोग बताते हैं कि तिलकोर के नियमित सेवन से पेनक्रियाज से इंसुलिन का स्राव नियमित हो जाता है.

बहरहाल, मिथिला में तिलकोर ही नहीं बाकी सब्जियों का तरुआ बनाने की विधि तकरीबन एक जैसी है. इसके लिए अमूमन बेसन या चावल के आटे (जिसको मैथिली में पिठार कहा जाता है) का इस्तेमाल किया जाता है. मिसाल के तौर पर आलू के तरुए की बात की जाए तो उसे पतले टुकड़ों में स्लाइस की तरह काटकर रख लिया जाता है. इस तरह जैसे कि चिप्स के लिए काटा जाता है. बेसन फेंटकर उसमें नमक हल्दी मिला दी जाती है. अगर इच्छा हो तो थोड़ी लाल मिर्च का पाउडर भी. नमक आप स्वाद के मुताबिक डाल सकते हैं.

फिर आलू के फ्लेक को उस बेसन में डुबोकर कड़कते तेल में तल लिया जाता है. आंच धीमी रखने से तरूआ अच्छे से पकता है. ऐसा ही, बैंगन और तिलकोर समेत अन्य सब्जियों के लिए भी किया जाता है.

तो अगली दफा आप जब भी किसी मैथिल दोस्त से मिलें तो उससे तरूआ खाने की फरमाईश जरूर करें. लेकिन याद रखिए, तरूआ तरूआ है, यह पकौड़ा नहीं है.

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Friday, February 16, 2018

जीवन का असली मजा तो गोलगप्पे में है

बाजार गया तो देखा भीड़-भाड़ के बीच भी एक जगह कुछ ज्यादा ही भीड़ थी. गोल घेरा-सा बना था. खासकर महिलाओं की ज्यादा तादाद थी. जिज्ञासावश वहां गया तो पता चला कि वहां गोलगप्पे बिक रहे हैं.

अब गोलगप्पों का तो क्या है, आपको दिल्ली में बंगाली मार्केट से लेकर कनॉट प्लेस और संगम विहार से लेकर रोहिणी तक मिल जाएंगे. लेकिन यह ऐसा शुद्ध स्वदेशी डिश है जो देश के हर हिस्से में मिलता है.

गोलगप्पा उर्दू का शब्द है. जैसा नाम से ही पता चलता है कि गोल पूरी जैसी चीज में आलू के चटकारेदार मसाला बनाकर डाला जाता है और उससे भी चटकारेदार रस उसमें भरकर कागज के पत्तल या पत्तों के दोने में रखिए और रखने के फौरन बाद गप्प से उदरस्थ कर जाइए. आपने देर की नहीं, कि बुलबुला फूटा नहीं. तोड़कर इसको खाना तो तकरीबन उतना ही नामुमकिन है जितना ग्यारह मुल्कों की पुलिस के लिए डॉन को पकड़ना.

तो गोल चीज को गप्प से मुंह रख लेने से ही शब्द बना गोलगप्पा. वैसे अंग्रेजीदां लोगों को बता दें कि अंग्रेजी के शब्दकोश में गोलगप्पे का अर्थ ‘पानी से भरा इंडियन ब्रेड’ या फिर ‘क्रिस्प स्फेयर ईटेन’ लिखा गया है! इसके ही एक और नाम पानीपूरी का शाब्दिक अर्थ है "पानी की रोटी" इसके मूल के बारे में बहुत कम जानकारी है पानी पूरी शब्द को 1955 में और गोलगप्पा शब्द को 1951 में दर्ज किया गया.

जरा बताइए तो, गोलगप्पे में डलता क्या है? एक पूरी होती है, जो या तो आटे से बनती है य़ा फिर सूजी मिलाकर. फिर गोलगप्पे वाला अपने अंगूठे से इसमें बड़ी मुलायमियत से एक छेद करता है, और उसमें एक मसाला डालता है. अलग-अलग इलाकों में गोलगप्पे में भरा जाने वाला मसाला अलग हो सकता है. लेकिन आलू उसमें केंद्रीय भूमिका में होता है.

आलू का मसाला तैयार करते वक्त उबले आलू को इमली के पानी, मिर्च, चाट मसाले, प्याज वगैरह के साथ मिलाया जाता है. इस मसाले को गोलगप्पे के अंदर डालकर उसे फौरन मटके में भरे एक और तरल से भरकर आपको दिया जाता है. इसमें भी इमली का रस और नमक होता है, मिर्च का पाउडर भी. लेकिन इसके अलहदा जायके भी होते हैं. कोई नींबू का पानी, पुदीने का पानी, खजूर का पानी और बूंदी डला सिरके का पानी तो है ही, हाल ही में मेरा साबका हींग के स्वाद वाले पानी से भी पड़ा. पर मेरा पसंदीदा तो झारखंड-बंगाल वाला हल्का खट्टापन लिए इमली की खटाई वाला पानी ही है.

अभी यह लिख रहा हूं तो गोलगप्पे का जायका जबान पर तैर गया है और मुंह में पानी आ गया.

वैसे झारखंड उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और बिहार में गोलगप्पे को गुप चुप कहते हैं. गोलगप्पे के दीवानों की संख्या पूरे देश में है. सो उन्होंने अपने प्यार के मुताबिक, गोलगप्पे को कई नाम दिए हैं. महाराष्ट्र में इसका नाम पानीपूरी बताशा है तो गुजरात में पानीपूरी. बंगाल और बांग्लादेश में इसको फुचका कहते हैं.

कुछ लोग गोलगप्पे की शुरूआत बनारस से मानते हैं. सन् 1970 में दिल्ली से बच्चों की एक मैगजीन निकलती थी, जिसका नाम रखा गया था ‘गोलगप्पा’. लेकिन कहा-सुना जाने वाला इतिहास कुछ और कहता है. जो लोग दिल्ली आए हैं या यहां रहते हैं उन्हें पुरानी दिल्ली खासकर लाल किले के आसपास के इलाके में जाने का मौका ज़रूर मिला होगा. जिस जगह चांदनी चौक है, वहां आपने एक चौक देखा होगा जिसे फव्वारा कहते हैं. इस अलकतरे की आज की सड़क पर बादशाह शाहजहां के वक्त में नहरें बनवाई गई थीं, जो यमुना का पानी किले और शहर तक लाती थीं. पूरे शाहजहांनाबाद (उस वक्त की दिल्ली) के बाशिंदे उसी नहर से पानी पिया करते थे.

लेकिन, एक वक्त आया जब उस नहर का पानी किसी वजह से गंदा हो गया और शहर के लोग कै-दस्त से परेशान हो गए. फिर शाहजहां के बेटी रोशनआरा ने शाही हकीम को बुलाकर इन बीमार लोगों के लिए कोई नुस्ख़ा तैयार करने को कहा. हकीम साहब ने नुस्खा तैयार कर दिया और लोगों को पिलाया. लोग चंगे हो गए पर कुछ लोगों को इसका जायका बहुत मजेदार लगा. सो उन शौकीन लोगों ने इस नुस्खे को बनाना जारी रखा और उसे आटे की छोटी पूरियों में भरकर पिया जाने लगा. तो इस तरह गोलगप्पे का जन्म हुआ जो कहीं फुचका, कहीं गुपचुप, कहीं पानी बताशा, कही पानी पूरी और कहीं किसी और नाम से जाना जाता है.

राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में इसे पताशी नाम से जाना जाता है. लखनऊ में पांच अलग-अलग टेस्ट के पानी के साथ मिलने वाले पांच स्वाद के बताशे भी काफी फेमस हैं. इसका पानी सूखे आम से बनाया जाता है. गुजरात में चपातियों को फुल्की कहा जाता है, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में गोल गप्पों को भी फुल्की कहा जाता है. इस नाम से इसे काफी कम लोग जानते हैं. मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में गोल गप्पों को टिक्की कहा जाता है.

जो लोग थोड़ी भदेस जबान जानते हैं उनके लिए पड़ाका शब्द जरूर पटाखे से ताल्लुक रखता होगा लेकिन अलीगढ़ में गोलगप्पों को पड़ाका ही कहते हैं. तो गुजरात के कुछ हिस्सों में इसे पकौड़ी भी कहा जाता है. इसमें सेव और प्याज मिलाया जाता है और पानी को पुदीने और हरी मिर्च से तीखा बनाते हैं. कीमत भी इसकी कोई ज्यादा नहीं. जो गोलगप्पा हम अमूमन खाते हैं अभी, वह कोई दस रुपए में चार मिलते है. बचपन में एक रू. के दस गोलगप्पे मिलते थे, इसकी याद तो मुझे भी है.

लेकिन असली मजा तो तब है जब कोई गोलगप्पे वाले से कहे, भैया इसमें मिर्ची थोड़ा और डालना. लोग जब गोलगप्पे जब खा चुके होते हैं तो साथ में घलुए में, भैया सूखी खिला दो कहना कत्तई नहीं भूलते. आखिर मूल से ज्यादा प्यारा सूद जो होता है. तो अगली दफा जब भी गोलगप्पे खाने जाएं तो शाही हकीम और शहजादी रोशनआरा को जरूर याद कीजिएगा और बरसात के मौसम में इससे बचने की कोशिश तो कीजिएगा, लेकिन साथ ही यह भी याद रखिएगा कि यह जो गोलगप्पा है न, यह है असली स्वदेशी डिश.

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Thursday, February 15, 2018

प्रेम केवल फिजिक्स-केमेस्ट्री-बॉयोलॉजी नहीं, हिस्ट्री-पॉलिटिक्स-सोशियो भी है...

बचपन में हीर-रांझा देखी थी, बेतरतीब-भगंदर टाइप दाढ़ी में राजकुमार जंगल झाड़ सूंघते-सर्च करते दिख रहे थे. तब लगा दाढ़ी प्रेम का पोस्टर है. भरोसा न हो तो एक और फिल्म हैः लैला-मजनूं. चॉकलेटी ऋषि कपूर, जिनके बांह चढ़ाए टैक्नीकल स्वेटरों का जमाना दीवाना था, इस फिल्म में ब्लेड क इंतजार करके थक कर बैठ गई दाढ़ी ओढ़े पत्थर झेल रहे थे.

जिस नाकाम प्रेमी ने झाड़ीनुमा दाढ़ी न बढ़ाई, उसके दुख का थर्मामीटर ही डाउन. मानो दाढ़ी दुख के प्रकटीकरण का उपकरण है. संकेत है. प्रेम में नाकाम हुए और दाढ़ी नहीं बढ़ाई? अरे मरदे कैसा प्यार किया था. छी दाढ़ी नहीं बढ़ाई. धिक्कार है दाढ़ी तक नहीं बढ़ाई?

प्रेम में मात खाए लोगों के दुख को साकार करने के भी कुछ प्रॉप (प्रॉपर्टी) होते हैं. बैकग्राउंड से ह्रदय छीलती दर्दनाक ध्वनि अविरल झरझराएः 'ये दुनिया, ये महफिल मेरे काम की नही या फिर, 'कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को. रंजीता के लाख मनुहार के बावजूद, पत्थर हों कि उछलते ही जाएं, रंजीता की दर्द भरी आवाज अगल-बगल छोड़ काल और चौहद्दी से परे ऑडिएंस को भावुक करती जाए, करती ही जाए.

पैमाने पर पैमाने खाली होते जाएं. मयखाने में लुढ़क जाएं. होश न रहे. (जोश तो पहले ही जा चुका है) आप यह न कहें कि आप क्यों ऐसे फलसफे दे रहे हैं कि प्रेम में लोग नाकाम ही होते हैं. अब प्रेम को लेकर मैं क्या कहूं, खुद कबीर कह गए हैं

आगि आंचि सहना सुगम, सुगम खडग की धार
नेह निबाहन ऐक रास, महा कठिन व्यवहार।

(अग्नि का ताप और तलवार की धार सहना आसान है, किंतु प्रेम का निरंतर समान रूप से निर्वाह अत्यंत कठिन कार्य है)

तो जो प्रेम करेगा उसका निवेदन माना भी जा सकता है, नामंजूर भी किया जा सकता है. तो अगर आप प्रेम करते हैं, और करना ही चाहिए, दुनिया में नफरत फैल रही है प्रेम कम है, तो आप फौरन से पेश्तर इजहार कर दिया करें.

पर आप इजहार करने में देर करेंगे तो खासी दिक्कत हो सकती है. कुछ भले लोग तो सही वक्त का इंतजार करते रह जाते हैं और जैसा कि एक मशहूर हिंदी फिल्म में नायक का संवाद है, कि मुहल्ले के उनके प्रेम को कोई डॉक्टर-इंजीनियर लेकर उड़ जाता है. अतएव, देर न करें.

चूंकि प्रेम करना कोई दिल्लगी नहीं, सो दिल की बात फौरन बता दें. प्रेम में डायरेक्ट ऐक्शन सबसे बेहतर विकल्प है. आप मान कर चलिए कि यह मिसफायर भी हो सकता है. महिला सशक्तिकरण के दौर में आपने शिष्टता में जरा भी चूक की (मुझे उम्मीद है कि आप खुद को बाहुबली न समझें कि आप लड़की छेड़ देंगे और पिटेंगे नहीं) तो आप खुद नायिका से, उसके भाई और पिता से पिटने के लिए तैयार रहें.

चूंकि बड़े लोग कह गए हैं कि प्रेम गली अति सांकरी होती है. ऐसे में, प्यार की राह में पिट-पिटा जाना, हड्डी तुड़वाना कोई बड़ी बात नहीं है. तो इतने बलिदान के लिए तैयार रहें.

प्रेम की बात हो रही है तो अभी इंटरनेट पर एक सनसनी का जिक्र किए बिना बात अधूरी रहेगी. प्रिया प्रकाश वॉरियर अब जबकि राष्ट्रीय क्रश घोषित हो चुकी हैं, तो आप भी उस वीडियो में दिखाए हीरो की तरह शर्माएंगे इसकी पूरी उम्मीद की जानी चाहिए.

इस दुनिया में प्रेमियों पर जुल्म-ओ-सितम की इंतिहा हुई है. कभी संप्रदाय के नाम पर, कभी जाति के नाम पर, कभी सिर्फ खानदानी दुश्मनी के नाम पर, मतलब अछूत कन्या से लेकर कयामत से कयामत तक, और कभी खुशी कभी गम से लेकर इश्कज़ादे तक, जमाना मुहब्बत करने वालों के खिलाफ गोलबंद रहा है. पर फिर कबीर याद आते हैं,

कहां भयो तन बिछुरै, दुरि बसये जो बास
नैना ही अंतर परा, प्रान तुमहारे पास।

शरीर बिछुड़ने और दूर में बसने से क्या होगा? केवल दृष्टि का अंतर है. मेरा प्राण और मेरी आत्मा तुम्हारे पास है.

यही वह प्रेम है. जो ढोला को मारू से, सोहिणी को महिवाल से, लैला को मजनूं से, मनु को शतरूपा से, शीरीं को फरहाद से, नल को दमयंती से, बाज बहादुर को रानी रूपमती से, मस्तानी को बाजीराव से और अमिताभ को रेखा से बांधे रखता है.

आखिर,

प्रीत पुरानी ना होत है, जो उत्तम से लाग
सौ बरसा जल मैं रहे, पात्थर ना छोरे आग।

प्रेम कभी भी पुराना नहीं होता. यदि अच्छी तरह प्रेम किया गया हो तो जिस तरह सौ साल तक भी वर्षा में रहने पर भी पत्थर से आग अलग नहीं होता उसी तरह प्रेम बना रहता है.

उम्मीद पर दुनिया कायम है और मुझे उम्मीद है कि देश और दुनिया के हर हिस्से में कायम नफरत हार जाएगी और प्रेम की फसल लहलहा उठेगी. मौका शिवरात्रि का भी है, तो शिव और सती के प्रेम को अपना उत्स बनाइए.

यह ठीक है कि पखवाड़ा ही बाबा वैलेंटाइन के नाम का है. पर महर्षि वात्स्यायन को मत भूलिए. बाबा वैलेंटाइऩ तो सिर्फ प्यार करने वालों को मिलवाते थे पर हमारे यहां तो वैलेंटाईन के भी चच्चा पैदा हुए हैं जो प्यार करने की खासी अंतरंग गतिविधि बता गए हैं. स्टेप बाई स्टेप.

और हां, सबको वात्स्यायन दिवस के पश्चिमी संस्करण की शुभकामनाएं.

Sunday, February 11, 2018

ये जो देश है मेरा की गौरव झा की समीक्षा

आज सुबह ही यह किताब पढ़कर खत्म की, तो सोचा दो-चार लाइनें लिख दी जाएं इस किताब के बारे में, जिसे हमारे मामा ने लिखा है। यह देश के जमीनी हकीकत की कहानियां हैं, जो उन्हें पत्रकारिता के दौरान अनेक जगह में किये गए यात्राओं से मिली हैं। उन जानकारियों, अनुभवों को उन्होंने बहुत रिसर्च के बाद किताब की शक्ल दी है।

इस किताब में भारत के पांच हिस्सों और वहां के लोगों का दर्द ए हाल बयां किया गया है। बुंदेलखंड (मध्य प्रदेश/उत्तरप्रदेश) के लोग पानी की कमी से जूझ रहे हैं, कूनो पालपुर (मध्य प्रदेश) के सहरिया जनजाति पर अभ्यारण्य की वजह से  विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है, नियामगिरि (ओडिशा) के डंगरिया-कोंध जनजाति पर बॉक्साइट खनन के लिए विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है, सतभाया पंचायत (ओडिशा) के लोगों को बढ़ते समंदर का खतरा परेशान किये हुए है, लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) के लोगों को नक्सलियों-पुलिस-राजनीतिक पार्टी के कैडर का खतरा हमेशा परेशान करता रहता है।

आपको पढ़कर यह भी पता चलेगा कि ऐसा नही है कि इन परेशानियों के निपटारे के लिए सरकारों ने प्रयास नही किये। ढेरों प्रयास किये गए और किये जा रहे हैं। बजट आवंटित किए जा रहे हैं, स्थानीय लोग भी प्रयास कर रहे हैं। पर एक चीज की कमी हर जगह दिख रही है वह है उन योजनाओं के क्रियान्वयन में कमी, लापरवाही, लूट-खसोट, अनियमितता।

उन जगहों के इतिहास, भूगोल, वर्तमान और भविष्य के बारे में काफी विस्तार से चर्चा की गई है।

आमलोगों से बातचीत करके उनकी समस्या को सामने रखने का बेहतरीन प्रयास आपको किताब में दिखेगा। हर इलाके के परेशानियों को आंकड़ों सहित दर्शाने के कारण उसे समझना आसान हुआ है, कई बारीक जानकारियां मिलेंगी आपको उन जगहों के बारे में, परिस्थिति के बारे में इस किताब को पढ़कर।

साथ में यह भी पता चलता है कि लेखक ने इसके लिए कितनी मेहनत की होगी।

एक बार जब आप किताब पढ़ना शुरू कीजियेगा तो आपको उन क्षेत्रों के बारे में जानने की इच्छा इतनी बढ़ जाएगी कि बिना खत्म किये किताब छोड़ना मुश्किल होगा। आपके भी जेहन में ये सवाल आएगा कि विकास के मायने सबके लिए एक ही पैमाने से तय किये जा सकते हैं क्या??

बेहतरीन किताब को लिखने के लिए मामा जी को बधाई। जय हो,शुभ हो।