Saturday, December 16, 2017

मेरा मधुपुरः पढ़ाई लिखाई हाय रब्बा

मेरा बेटा एक प्राइवेट स्कूल की चौथी कक्षा में पढ़ता है. पहली क्लास में उसका एडमिशन का मिशन मेरे लिए कितना कष्टकारी रहा, वह सिर्फ मैं जानता हूं. इसलिए नहीं कि बेटे का दाखिला नहीं हो रहा था. बल्कि इसलिए, क्योंकि एडमिशन से पहले इंटरव्यू की कवायद में मुझे फिर से उन अंग्रेजी कविताओं-राइम्स-की किताबें पढ़नीं पड़ी, जो हमारे टाइम्स (राइम्स से रिद्म मिलाने के गर्ज से, पढ़ें वक्त) में हमने कभी सुनी भी न थीं.

अंग्रेजी स्कूलों से निकले हमारे साथी ज़रूर 'बा बा ब्लैक शीप', 'हम्प्टी-डम्प्टी' और 'चब्बी चिक्स' जानते होंगे, लेकिन बिहार और बाकी के राज्य सरकारों के स्टेट बोर्ड से निकले मित्र जरूर इस बात से सहमत होंगे कि घरेलू स्तर पर छोड़कर औपचारिक रूप से अंग्रेजी से मुठभेड़ छठी कक्षा में हुआ करती थी.

बहरहाल, शिक्षा के उस वक्त की कमियों की ओर इशारा करना मेरा उद्देश्य नहीं. चौथी के मेरे सुपुत्र की किताबों की कीमत छह से सात हजार के आसपास थी. मुझे कुछ-कुछ अंदाजा तो था लेकिन सिर्फ किताबों की कीमत इतनी रहने वाली है इस पर मैं श्योर नहीं था.

मुझे अपना वक्त याद आय़ा. जब मैं अपने ज़माने की, हालांकि हमारा ज़माना इतना पीछे नहीं है, सिर्फ अस्सी के दशक के मध्य के बरसों की बात है, की बात करता हूं तो मुझे लगता है कि हम न जाने कितनी दूर चले आए हैं. बहुत सी बातें एकदम से बदल गईं हैं. 

हालांकि, प्रायः सारे बदलाव सकारात्मक से लगते हैं. लेकिन पढ़ाई के बारे में ऐसा ही कहना, कम से कम पढ़ाई की लागत के बारे में... हम स्वागतयोग्य तो नहीं ही मान सकते.

मेरा पहला स्कूल सरस्वती शिशु मंदिर था. कस्बे के कई स्कूलों को आजमाने के बाद तब के दूसरे सबसे अच्छे स्कूल (संसाधनों के लिहाज से) शिशु मंदिर ही था. हमारे कस्बे का सबसे बेहतर स्कूल कॉर्मेल कॉन्वेंट माना जाता था...अंग्रेजी माध्यम का. पूरे कस्बे में इसमें बच्चे का दाखिला गौरव की बात मानी जाती है, हालांकि जिनके बच्चों का दाखिला इस स्कूल में नहीं हो पाता, वो यह कह कर खुद को दिलासा देते कि स्कूल नहीं पढ़ता बच्चे पढ़ते हैं. और इसकी तैयारी हम घर पर ही करवाएंगे अच्छे से. 

अब यह भी जानिए कि तैयारी किस की? नेतरहाट में या नवोदय में छठी कक्षा में एडमिशन की. नवोदय का तो पता नहीं, लेकिन झारखंड में नेतरहाट ने अपनी साख बचाई हुई है अब तक.

वैसे भी, तैयारी तो खैर क्या होती होगी. हमारा दाखिला सरस्वती शिशु मंदिर में हुआ, दाखिले की फीस थी 40 रुपए और मासिक शुल्क 15 रुपए. यह सन 84' की बात होगी. इसमें यूनिफॉर्म था. नीली पैंट सफेद शर्ट...लाल स्वेटर. बस्ता जरूरी था और टिफिन भी ले जाना होता, जो प्रधान जी के मूड के लिहाज से लंबे या छोटे वाले भोजन मंत्र के बाद खाया जाता.

भोजन के पहले मंत्रो की इस अनिवार्यता सबसे बुरी बात लगती थी. चार साल उसमें पढ़ने के बाद जब फीस बढ़कर 25 रुपये हो गया, और तब घरवालों को लगा कि यह शुल्क ज्यादा है.

बहरहाल, सरस्वती शिशु मंदिर से निकाल कर हमें  तिलक विद्यालय में भर्ती कराया गया, जिसे राज्य सरकार चलाती थी और यह मशहूर था कि गांधी जी उस स्कूल में आए थे. गांधी जी की वजह से पूरे कस्बे में यह स्कूल गांधी स्कूल भी कहा जाता. एडमिशन फीस 5 रुपये, और सालाना शुल्क 12 रुपये.

गांधी स्कूल की खासियत थी कि हम 10 बजे स्कूल में प्रार्थना करने के बाद, जो कि हमारे लिए बदमाशियों का सबसे टीआरपी वक्त होता था, सफाई के लिए मैदान में इकट्ठे होते थे. स्कूल के अहाते में चारों तरफ शीशम, सागवान और यूकेलिप्टस के ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे और उसके पत्ते अहाते में गिरते तो उसे साफ कौन करेगा? स्कूल में कोई चतुर्थवर्गीय कर्मचारी नहीं था. स्कूल में शौचालय भी नहीं था. स्कूल में हैंडपंप था, लेकिन कई बरसों से खराब था. 

स्कूल में अगर कुछ था, तो मास्टर थे, छात्र थे. कड़क अनुशासन था. पिटाई थी. गजानन सर थे, महानंद सर थे. इन सरों के सर के तापमान के बारे में बाद में.

मैदान में पत्ते और कागज चुनने के बाद, क्लास के फर्श की सफाई का काम होता। लाल रंग के उस ब्रिटिश जमाने के फर्श पर ही बैठना होता था इसलिए सफाई जरूरी थी. यह काम रोल नंबर के लिहाज से बंधा होता.

उस वक्त भी, जो शायद 1987 का साल था, किताबों की कीमत हमारी ज़द में हुआ करती थी. पांचवी क्लास में विज्ञान की किताब की कीमत 6 रुपये 80 पैसे थी और उसे कोर्स की सबसे मंहगी किताब माना जाता था. बिहार टेक्स्टबुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन पाठ्य पुस्तकें छापा करती थी, जिनमें सबसे सस्ती थी संस्कृत की किताब और सबसे मंहगी विज्ञान की.

उसमें भी घरवालों की कोशिश रहती कि किसी पुराने छात्र से किताबें सेंकेंडहैंड दिलवा दी जाएं. आधी कीमत पर. किताब कॉपियां हाथों में ले जाते. सस्ते पेन...बॉल पॉइंट में भी कई स्तर के...25 पैसे वाली बॉल पॉइंट का पॉइंट पीतल का होता, उससे मोटी लिखाई होती. 35 पैसे वाले थोड़ी ठीक होती, लेकिन 75 पैसे में बॉल पॉइंट रीफिल का पॉइंट स्टील का होता था, और वह पाने के लिए ज्यादातर छात्र अपने बड़े भाईयों, पिता, या माताओं के सामने घिघियाते थे. (अगर दिलचस्पी लिखने में होती थी) 

कलमों के इस परिदृश्य को रेनॉल्ड्स ने बदल दिया, उस पर अगली पोस्ट में लिखेंगे.

जिन दिनों की बात मैं कर रहा हूं तब स्याही का इस्तेमाल धीरे धीरे कम तो हो रहा था, लेकिन फैशन से बाहर नहीं हुआ था. उस वक्त बिहार सरकार द्वारा वित्त प्रदत्त सब्सिडी वाले कागजों से वैशाली नाम की कॉपियां आतीं थीं...जिन पर गत्ते की जिल्द चढ़ी होती. अब हमारी गुरबत पर न हंसिएगा...वैशाली की कॉपी में नोट्स बनाना मेरे और मेरे दोस्तों का बड़ा ख्वाब हुआ करता. मध्यम मोटाई की कॉपी दो रुपये की आती थी...हमारी सारी बचत वही खरीदने में खर्च होती. 

हमारे स्कूल (तिलक विद्यालय) में ज्यादातर ब्लैक बोर्ड का ब्लैकनेस घिसकर सुफेद हो रखा था. आज बेटे के स्कूल में कंप्यूटरों की भरमार है. एक कक्षा में तीन तीन तरह के बोर्ड हैं. वाइट बोर्ड, ग्रीन बोर्ड और एक और प्रोजेक्टर की स्क्रीन.  

पता नहीं, इतने किस्म के बोर्ड पर क्या पढ़ लेते हैं बच्चे और क्या पढ़ा लेते हैं शिक्षक! इनसे पढ़ाई होती तो पहले के मुकाबले शायद हम ज्यादा रामानुजम, ज्यादा बसु, ज्यादा शांति स्वरूप भटनागर और ज्यादा भाभा पैदा करते. 

स्कूलों की फीस की रकम देखिए...पढ़ाई महंगी हो गई है या वक्त का तकाजा है...या लोग संपन्न हो गए है या पढ़ाई सुधर गई है...कस्बे और शहर का अंतर....वही सोच रहा हूं. 

सरकारी स्कूलों में पढ़कर और जिंदगी के ढेर सारे साल गरीबी में बिताकर हमने खोया है या पाया है...

Monday, December 11, 2017

राहुल अब शहज़ादे नहीं रहे!

तेरह साल तक टालते रहने के बाद नेहरू-गांधी खानदान के वारिस ने आखिरकार कांग्रेस की कमान तो संभाली लेकिन सवाल यही है कि क्या वह इस सबसे पुरानी औप पस्त पड़ी पार्टी में नई जान फूंक पाएंगे? खासकर तब, जब मौजूदा समय में सियासी परिस्थितियां तकरीबन कांग्रेसमुक्त भारत की तरफ ही बढ़ रही हैं.

16 दिसंबर से (संयोग है कि यह विजय दिवस भी है) राहुल कांग्रेस के अध्यक्ष का पदभार संभालेंगे. अब यह और बात है कि यह जिम्मेदारी उनके लिए पद की तरह रहता है या भार की तरह. हाल तक, गाहे-ब-गाहे कुछ मौकों को छोड़कर राहुल गांधी ने ज्यादा कुछ ऐसा किया नहीं कि उन पर भरोसा किया जा सके.

उनके लिए पहली चुनौती तो यही होगी कि वह खुद पर नेहरू-गांधी खानदान के छठे सदस्य के रूप में बने अध्यक्ष का तमगा छुड़ा सकें. भाजपा ने उन पर नाकामी का ठप्पा चस्पां करने में सोशल मीडिया मशीनरी का बखूबी इस्तेमाल किया है.

हालांकि, पिछले तेरह साल में राहुल गांधी लगातार कमजोर और हाशिए पर पड़े वंचित तबके की आवाज बनने की कोशिश करते रहे. लेकिन उनकी कोशिशें बड़े कदम की बजाय प्रतीकात्मक ही रहीं.

जरा तारीखवार गौर करें,

2008 में राहुल गांधी ओडिशा के कालाहांडी जिले के नियामगिरि में डंगरिया कोंध आदिवासियों के साथ खड़े हुए और कांग्रेस ने उनको नियामगिरि का सेनापति घोषित किया. बाद में, नियामगिरि में वेदांता को खनन पट्टा रद्द कर दिया गया. अगले साल 2009 में उन्होंने भारत की खोज यात्रा शुरू की था और यूपी के दलितों के यहां खाना खाकर खुद को जमीन से जुड़ा नेता साबित करने की कोशिश की. इसका फायदा 2009 के लोकसभा चुनावों में मिला.

साल 2011 में राहुल किसानों के भूमि अधिग्रहण के खिलाफ भट्टा पारसौल में आंदोलन के हिस्सेदार बने. बाद में केंद्र की यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना कानून पारित कराया.

इसके अलावा राहुल ने मौका बेमौका कभी मुंबई लोकल में सफर करके, कभ केदारनाथ मंदिर जाकर, कभी अरूणाचल के छात्र नीडो तानियम के लिए खड़े होकर, कभी केरल के मछुआरे के यहां खाना खाकर खुद को स्थापित करने की कोशिश की. कभी वे पटपड़गंज में सफाई कर्मचारियों के साथ धरने पर बैठे तो रोहित वेमुला की खुदकुशी के बाद भाजपा पर टूट पड़े. कन्हैया मामले में भी राहुल गांधी ने सक्रियता दिखाते हुए जेएनयू में जाकर छात्रों से मुलाकात की थी.

लेकिन उनके कुछ कदमों से उनकी भद भी पिटी है.

नोटबंदी के दौरान 4 हजार रु. निकालने के लिए कतार में खड़ा होने और एक बार फटी जेब दिखाने की वजह से वे सोशल मीडिया पर ट्रोल हुए.

राहुल गांधी ट्रोल होने की वजह से भी लोकप्रिय हैं.

लेकिन हालिया महीनों में ट्विटर पर तंज भरे और तीखे ट्वीट करने की वजह से राहुल ने सबको हैरत में डाल दिया है.

लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष बने राहुल गांधी के सामने कई चुनौतियां दरपेश हैं. 1999 से लेकर 2014 तक ही देखें तो कांग्रेस का प्रदर्शन गर्त में चला गया है. 1999 में कांग्रेस को 114 सीटें थी, जो 2004 में 145, 2009 में 206 और अब 2014 में महज 44 रह गई है. इसके बरअक्स भाजपा 182, 138, 116 और 282 पर आई है. कांग्रेस का वोट शेयर भी इन्ही सालों मे क्रमशः 28, 27,29 और 20 फीसदी रहा है.

अब कांग्रेस सुप्रीमो बने राहुल को कुछ काम प्राथमिकता के स्तर पर करने होंगे. इनमें संगठन में नई जान फूंकने से लेकर नई टोली का गठन करना, राज्यों में ताकतवर नेताओं को आगे बढ़ाना, 2019 के लिए कार्यकर्ताओं में जोश लाना, गुटबाजी पर लगाम लगाना और भरोसेमंद और निरंतर सक्रिय (जी हां, छुट्टियों पर विदेश सरक जाने की अपनी आदत छोड़नी होगी) नेता के रूप में पेश होना होगा.

राहुल गांधी के एक भाजपा विरोधी गठजोड़ तैयार करना होगा. लेकिन बिहार में वह नीतीश के अपने पाले में रोक नहीं सके. पीएम बनने की ख्वाहिशमंद ममता उनके लिए दूसरी चुनौती होंगी जो वाम दलों के साथ एक मंच पर शायद ही आएं. दूसरी तरफ, मायावती और मुलायम भी शायद ही हाथ मिलाना पसंद करें.

2019 से पहले राहुल के लिए 2018 भी एक चुनौती बनकर मुंह बाए खड़ा है. जब चार बड़े राज्यों के चुनाव होने हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ भाजपा के सूबे हैं, कर्नाटक में उनकी अपनी सरकार है. मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास 230 में से 58 सीटें हैं, 37 फीसदी वोट शेयर है, सूबे के लोकसभा की 29 सीटों में से महज दो कांग्रेस के पास हैं और वोट शेयर 35 फीसदी हैं (यानी वोट शेयर इंटैक्ट है)

राजस्थान में 200 विधानसभा सीटें हैं, इनमें कांग्रेस के पास महज 21 हैं. वोट शेयर भी 33 फीसदी है. राजस्थान से लोकसभा में एक भी सीट कांग्रेस के पास नहीं, लेकिन 31 फीसदी वोट जरूर मिले थे.

छत्तीसगढ़ में 90 विधानसभा सीटें हैं. कांग्रेस के पास इनमें से 39 सीटें हैं. वोट शेयर जरूर बढ़िया 40 फीसदी है लेकिन लोकसभा चुनाव में पासा पलट गया था जब राज्य की कुल 11 लोस सीटों में से कांग्रेस 20 फीसदी वोट हासिल कर सकी और सिर्फ 1 सीट पर जीत दर्ज कर सकी.

कर्नाटक में मामला थोड़ा अलग है. 224 विधानसभा सीटों वाले सदन में कांग्रेस के 122 सदस्य हैं. वोट शेयर 37 फीसदी है. वहां की 28 लोस सीटों में से कांग्रेस ने 9 जीती और वोट शेयर भी 41 फीसदी हासिल किया. यानी कर्नाटक में बहुत सत्ताविरोधी रूझान न हुआ तो कांग्रेस मजबूत स्थिति में रह सकती है. क्योंकि मोदी लहर (कर्नाटक में भाजपा ने 17 सीटें जीती हैं और 43 फीसदी वोट शेयर हासिल किया है) के बावजूद कांग्रेस का वोट शेयर भाजपा से महज 2 फीसदी कम रहा और इसी दो फीसदी वोट ने दोनों पार्टियों के बीच 8 सीटों का अंतर पैदा कर दिया.

बहरहाल, राहुल गांधी अब शहजादे से एक नेता में बदल रहे हैं. वह अब कांग्रेस अध्यक्ष हैं. सत्ता को जहर कहने वाले राहुल को अब पार्टी के ढांचे को नया रंग-रूप देने के साथ-साथ चुनावों में जीत दिलानी ही होगी. क्योंकि सत्ता से ज्यादा दिन दूर रही पार्टी का जनाधार ज्यादा तेजी से खिसकता है.

Sunday, December 3, 2017

निपट अकेला मैं

मैं
निर्जन में,
झुकते कंधों वाला बरगद.
मोनोलिथ पहाड़ में
थोड़ी सी जगह में उग आया.

मैं,
निपट सुनसान में
खुद से बातें करता.
मेरी शाखों पर आकर बैठते तो हैं परिन्दे
मुझे भाता है
उनका आना-बैठना-कूकना-उछलना
पर, परिन्दें नहीं समझते मेरी भाषा
पेड़ की भाषा मैं मौन मुखर होता है.
जो समझ सके
पेड़ की भाषा
इंतजार कर रहा हूं
मैं

Wednesday, October 25, 2017

गुस्सैल नौजवान विजय अब फेंके हुए पैसे भी उठाता है, बांटता भी है

उस दौर में जब राजेश खन्ना का सुनहरा रोमांस लोगों के सर चढ़कर बोल रहा था, समाज में थोड़ी बेचैनी आने लगी थी. आराधना से राजेश खन्ना का आविर्भाव हुआ था. खन्ना का रोमांस लोगों को पथरीली दुनिया से दूर ले जाता, यहां लोगों ने परदे पर बारिश के बाद सुनसान मकान में दो जवां दिलों को आग जलाकर फिर वह सब कुछ करते देखा, जो सिर्फ उनके ख्वाबों में था.

राजेश खन्ना अपने 4 साल के छोटे सुपरस्टारडम में लोगों को लुभा तो ले गए, लेकिन समाज परदे पर परीकथाओं जैसी प्रेम कहानियों को देखकर कर कसमसा रहा था. इस तरह का पलायनवाद ज्यादा टिकाऊ होता नहीं. सो, ताश के इस महल को बस एक फूंक की दरकार थी. दर्शक बेचैन था. उन्ही दिनों परदे पर रोमांस की नाकाम कोशिशों के बाद एक बाग़ी तेवर की धमक दिखी, जिसे लोगों ने अमिताभ बच्चन के नाम से जाना.

मंहगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और पंगु होती व्यवस्था से लड़ने वाली एक बुलंद आवाज़ की ज़रुरत थी. ऐसे में इस लंबे लड़के की बुलंद आवाज़ परदे पर गूंजने लग गई. इस नौजवान के पास इतना दम था कि वह व्यवस्था से खुद लोहा ले सके और ख़ुद्दारी इतनी कि फेंके हुए पैसे तक नहीं उठाता.

गुस्सैल निगाहों को बेचैन हाव-भाव और संजीदा-विद्रोही आवाज़ ने नई देहभाषा दी. उस वक्त जब देश जमाखोरी, कालाबाज़ारी और ठेकेदारों-साहूकारों के गठजोड़ तले पिस रहा था, बच्चन ने जंजीर और दीवार जैसी फिल्मों के ज़रिए नौजवानों के गुस्से को परदे पर साकार कर दिया.
विजय के नाम से जाना जाने वाला यह शख्स, एक ऐसा नौजवान था, जो इंसाफ के लिए लड़ रहा था, और जिसको न्याय नहीं मिले तो वह अकेला मैदान में कूद पड़ता है.

कुछ लोग तो इतना तक कहते है कि अमिताभ के इसी गुस्सेवर नौजवान ने सत्तर के दशक में एक बड़ी क्रांति की राह रोक दी. लेकिन बदलते वक्त के साथ इस नौजवान के चरित्र में भी बदलाव आया. जंजीर में उसूलों के लिए सब-इंसपेक्टर की नौकरी छोड़ देने वाला नौजवान फिल्म देव तक अधेड़ हो जाता है. जंजीर में उस सब-इंस्पेक्टर को जो दोस्त मिलता है वह भी ग़ज़ब का. उसके लिए यारी, ईमान की तरह होती है.

बहरहाल, अमिताभ का गुस्सा भी कुली, इंकलाब आते-आते टाइप्ड हो गया. जब भी इस अमिताभ ने खुद को या अपनी आवाज को किसी मैं आजाद हूं में या अग्निपथ में बदलना चाहा, लोगों ने स्वीकार नहीं किया.

तो नएपन के इस अभाव की वजह से लाल बादशाह, मत्युदाता, और कोहराम का पुराने बिल्लों और उन्हीं टोटकों के साथ वापस आया अमिताभ लोगों को नहीं भाया. वजह- उदारीकरण के दौर में भारतीय जनता का मानस बदल गया था. अब लोगो के पास खर्च करने के लिए पैसा था, तो वह रोटी के मसले पर क्यों गुस्सा जाहिर करे.

उम्र में आया बदलाव उसूलों में भी बदलाव का सबब बन गया. देव में इसी नौजवान के पुलिस कमिश्नर बनते ही उसूल बदल जाते हैं, और वह समझौतावादी हो जाता है.

लेकिन अमिताभ जैसे अभिनेता के लिए, भारतीय समाज में यह दो अलग-अलग तस्वीरों की तरह नहीं दिखतीं. दोनों एक दूसरे में इतनी घुलमिल गए हैं कि अभिनेता और व्यक्ति अमिताभ एक से ही दिखते हैं. जब अभिनेता अमिताभ कुछ कर गुज़रता है तो लोगों को वास्तविक जीवन का अमिताभ याद रहता है और जब असल का अमिताभ कुछ करता है तो पर्दे का उसका चरित्र सामने दिखता है.

अमिताभ का चरित्र बाज़ार के साथ जिस तरह बदला है वह भी अपने आपमें एक चौंकाने वाला परिवर्तन है. जब ‘दीवार के एक बच्चे ने कहा कि उसे फेंककर दिए हुए पैसे मंज़ूर नहीं, पैसे उसको हाथ में दिए जाएं, तो लोगों ने ख़ूब तालियां बजाईं.

बहुत से लोगों को लगा कि यही तो आत्मसम्मान के साथ जीना है. उसी अमिताभ को बाज़ार ने किस तरह बदला कि वह अभिनेता जिसके क़द के सामने कभी बड़ा पर्दा छोटा दिखता था, उसने छोटे पर्दे पर आना मंजूर कर लिया.

फिर उसी अमिताभ ने लोगों के सामने पैसे फ़ेंक-फेंककर कहा, ‘लो, करोड़पति हो जाओ.’ कुछ लोगों को यह अमिताभ अखर रहा था लेकिन ज्यादातर लोगों को बाज़ार का खड़ा किया हुआ यह अमिताभ भी भा गया. अपनी फिल्मों के साथ आज अमिताभ हर मुमकिन चीज बेच रहे हैं. वह तेल, अगरबत्ती, पोलियो ड्रॉप से लेकर रंग-रोगन, बीमा और कोला तक खरीदने का आग्रह दर्शकों से करते हैं. करें भी क्यों न, आखिर उनकी एक छवि है और उन्हें अपनी छवि को भुनाने का पूरा हक है. दर्शक किसी बुजुर्ग की बात की तरह उनकी बात आधी सुनता भी है और आधी बिसरा भी देता है.

बहरहाल, अमिताभ आज भी चरित्र निभा रहे हैं, लेकिन उनके शहंशाहत को किसी बादशाह की चुनौती झेलनी पड़ रही है. हां, ये बात और है कि शहंशाह बूढा ज़रुर हो गया है पर चूका नहीं है. बाज़ार अब भी उसे भाव दे रहा है क्योंकि उसमें अब भी दम है.